शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

गाजर का हलवा

आज सुबह से ही निर्मला बहुत व्यस्त थी। बाजार, घर का काम करते करते थक गई थी वो। पाँच मिनट बैठती थी एक कप चाय पीने को, फिर काम में लग जाती। क्यों न हो, आखिर उसका बेटा पूरे  डेढ़ साल बाद उससे मिलने आ रहा था। निर्मला का बेटा - राजेश।

राजेश के बारे में सोचने से ही उसके चेहरे पे ममतामयी मुस्कान आ जाती। शुरू से ही थोडा शर्मीला था, पर बच्चों की बात समझने के लिए माँ को कभी शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। उसके भाव से वो समझ जाती कि अब उसे कुछ चाहिए या कुछ कहना है। फिर प्यार से गोद में बिठाती और पूछती, "मेरे राजू को कुछ चाहिए?" वो धीरे से सर हिला देता और निर्मला अलादीन के जिन्न की तरह उसकी हर इच्छा पूरी कर देती।


फलैश बैक से निकल कर निर्मला उठी और उसने कड़ाही गैस पर चढ़ा दी। बस डेढ़ घंटा और। अरे राजू के आने में नहीं, वो तो शाम को आएगा। उसके मनपसंद गाजर के हलवे को बनने में। घी, कद्दूकस की हुई गाजरें, चीनी, खोया और ढेर सारे मेवे। सब चीज़ें उसने एक जगह पर इक्कठी कर ली थी।

घी गरम करके उसने धीमी आंच पर ही गाजर को भूनना शुरू किया। निर्मला को याद आया कि कैसे बचपन में, जैसे ही स्कूल से आ के राजू को पता चलता था कि आज गाजर का हलवा बना है, तो वह खाने की जगह हलवा ही खाता। मन भर के। राजू का मन भरता और निर्मला को लगता उसका पेट भर गया। फिर तो आते जाते दो चार चम्मच खाता रहता।

"बिलकुल पागल था हलवे के पीछे," निर्मला ने मुस्कुराते हुए मानों खुद को ही कहा हो। और चीनी डाल के फिर से भूनना शुरू कर दिया। पूरे पौने दो घंटे लगे निर्मला को गाजर का हलवा बनाने में। बाजुओं ने बिलकुल ही जवाब दे दिया था। वो निढाल सी हो के बिस्तर पे बैठ गई। उसे धयान आया कि सुबह से उसने कुछ खाया ही नहीं है। सिर्फ तीन बार चाय ही पी है। तभी उसे इतनी कमजोरी लग रही थी। पर अब मन नहीं था कुछ बनाने का। एक बार मन हुआ कि थोड़ा सा हलवा ही खा ले। फिर लगा नहीं पहले राजू को चखाएगी तभी तो उसकी मेहनत सफल होगी... जब वो और माँगेगा।

पर रोटी बनाने की इच्छा नहीं थी। देखा तो फ्रिज में दो पीस ब्रेड के रखे थे। बस वही खा लिए। किसी के लिए खाना बनाना जहाँ उसे तृप्ति देता था, अपने लिए कुछ भी बनाना उसके लिए बस सिरदर्दी होती थी।

ब्रेड खा के निर्मला थोड़ी देर लेट गई। शायद बुढ़ापे के कारण ज्यादा काम करने से थकान हो गई थी। वो कब सो गई पता ही नहीं चला। शाम को कॉल-बेल की तेज आवाज़ सुन के उसकी आँख खुली। "अरे! इतनी देर हो गई। लाइट भी नहीं जलाई। पता नहीं राजू कहाँ पहुंचा होगा।" सब एक साथ बोलते हुए वो बिस्तर से उठी दरवाज़ा खोलने।

"क्या माँ? कब से बेल बजा रहा हूँ। तुम्हें पता भी था मैं आ रहा हूँ फिर भी ऐसे सो रही हो। कोई चिंता ही नहीं है। इतना लम्बा सफ़र... उफ़!" कहता हुआ राजेश माँ के पैर छूने की रस्म अदा करता हुआ अन्दर चला गया।

निर्मला वहीं खड़ी रही सारे आशीर्वाद मुँह में लिए हुए। फिर अन्दर आते हुए, दरवाज़ा बंद करते-करते निर्मला ने अफ़सोस भाव से कहा मानो अपनी सफाई दे रही हो, "पता नहीं बेटा कैसे आँख लग गई। मैं तो इस समय कभी सोती भी नहीं। बहुत देर से बेल बजा रहे थे क्या?"

"चलो छोड़ो। जो हो गया सो हो गया।"

निर्मला रसोई में चली गई, पानी लेने। पानी का गिलास पकड़ाते हुए बोली," कोई दिक्कत तो नहीं हुई सफ़र में?"

"नहीं सब ठीक था," राजेश ने पानी पीते हुए, थोड़ा शांत होते हुए कहा।

"घर में बहू, सौम्या, रचित सब ठीक हैं?'

"सब ठीक हैं माँ। मैं जरा फ्रेश हो के आता हूँ," राजेश ने उठते हुए कहा।

"जा बेटा। चाय चढ़ाऊ क्या?" निर्मला ने पूछा।

"हाँ माँ।"

निर्मला किचन में चाय चढ़ाते हुए सोचने लगी पता नहीं इन मरी गाजरों में आजकल कितनी खाद डालने लगे हैं। पहले तो इसी हलवे की इतनी खुशबू आती थी कि घर में घुसते ही राजू को पता चल जाता था कि आज गाजर का हलवा बना है।

चाय के साथ बिस्किट और नमकीन ले कर निर्मला कमरे में गई। चाय का कप हाथ में ले कर राजेश ने माँ का, पड़ोसियों का, रिश्तेदारों का हाल चाल पूछा। निर्मला के पास तो बातों का ढेर था। पर फिलहाल उन्हीं सवालों के जवाब दिए जो उसने पूछे थे। चाय खत्म कर के राजेश ने कहा, "कल मेरी मीटिंग है, यहीं होटल में। तो मुझे थोड़ी सी तैयारी करनी है।"

"ठीक है राजू। बस इतना बता दे कौन सी सब्जी खायेगा? दम आलू, पनीर या फिर तेरा स्पेशल भर्ता," माँ ने लाड़ से पूछा।

"अरे नहीं माँ। इतना हैवी कुछ नहीं खाऊंगा। दम आलू में तो बहुत आयल होगा। कुछ भी हल्का सा बना लो," राजेश ने लैपटॉप खोलते हुए कहा।

अच्छा। हल्का सा। उसने फटाफट दाल और बीन्स आलू चढ़ा दिए।

दो घंटे बाद राजेश का काम ख़तम हुआ। निर्मला को जोर से भूख लगी हुई थी, पर बेटे के बगैर कैसे खाती तो बस चार पाँच बार दरवाज़े से देख कर आ गई और इंतजार करती रही उसके काम के खत्म होने का।

माँ ने दाल, सब्जी परोसी और घी से चुपड़ी नरम सी रोटी निकाल कर प्लेट में रखी और अपनी थाली भी लगाने लगी। "यह क्या माँ। आपने रोटी में घी लगा दिया। मैं तो आजकल खुशक फुल्का लेता हूँ। चलो अब कल मत लगाना।"

निर्मला को याद आया कैसे दो-दो बार घी लगवा के रोटी बिना सब्जी के खा जाता था और कहता था, "माँ! आप तो मुझे ऐसे ही रोटी दे दिया करो। आपकी रोटी तो इतनी नरम होती है कि सब्जी की भी जरूरत नहीं पड़ती।"

खैर दोनों खाना खाने लगे। सब्जी खाते हुए बोला, "माँ! रीता तो अब बेक्ड सब्जियां बनाती है। आप आओगी न तो मैं बेक्ड बीन्स बनवाऊंगा। बिलकुल फैट नहीं होता। देखो, मैंने दो महीने में तीन किलो वज़न कम किया है।"

"हाँ। कुछ कमजोर सा तो लग रह है बेटा," निर्मला ने उसे गौर से देखते हुए कहा।

"कमजोर नहीं माँ... फिट," राजेश ने हँसते हुए कहा। निर्मला बस मुस्कुरा दी। खाने के बाद वो दो प्लेटों में हलवा ले आई। लगा देख के ही वो चिल्ला देगा।

हलवा देख कर राजेश ने कहा, "अरे वाह! गाजर का हलवा!"

निर्मला को लगा चलो उसकी बनाई कोई चीज़ तो पास हुई। वो प्यार से उसे निहारने लगी।

"पर माँ इतना नहीं खाऊंगा। बस दो चम्मच। मैंने तो मीठा खाना बिलकुल बंद कर दिया हुआ है। पर आपके हाथ का हलवा छोड़ नहीं सकता," कहते हुए उसने दो चम्मच हलवा एक कटोरी में निकाल लिया। 

और निर्मला को अचानक लगा वो बहुत थक गई है।

© उपमा डागा
२०१२

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

बारिश और धूप

खड़े-खड़े वो थक गई थी, तो कमरे में ही टहलते टहलते कुर्सी पे जा के बैठ गई। पता नहीं आज घड़ी की सुईयां धीरे चल रही थी या वो ज्यादा बैचैन थी।

वक़्त था कि कट ही नहीं रहा था। उसने चार बजे नीरव को फ़ोन किया था कि प्लीज़ आज घर जल्दी आ जाना और इस समय रात के १० बज गए थे और अभी तक उसका कुछ पता नहीं था। धीरे-धीरे गुस्सा चिंता में बदलता जा रहा था।

बचपन से ही आरती को बारिश बहुत अच्छी लगती थी। ऐसा लगता था मानो भगवान ने सारे ग़म, चिंता भुलाने के लिए ही इस मौसम को बनाया है। बारिश के आते ही वो बस चहकने सी लगती।

पकौड़े, पुए और कितने ही पकवानों की वो माँ से फरमाइश करती और बारिश में खूब भीगती। उसकी तो जैसे मस्ती दुगनी हो जाती। माँ बीच-बीच में ज्यादा भींगने से मना करती, बीमार होने का डर उसे सताने लगता। इस पर पिता जी कहते, "करने दो उसे मस्ती। यह भोलापन और उछलकूद देखने को बाद में हम तरस जायेंगे।" पहले उसे इसका मतलब तो समझ में नहीं आया पर पिता जी की इजाजत मिलना उसके लिए काफी था।

अब उसे पिता जी की उन बातों का मतलब समझ में आ गया था शायद। शादी के बाद एक संयुकत परिवार में गई थी वो। बहुएं कैसे रहती हैं यह उसे पहले कुछ दिनों में ही समझ आ गया था। मस्ती उसे पसंद थी पर रिश्ते निभाते माँ को देखा था और शायद देखते देखते सीख भी गई थी।

तीन सालों बाद नीरव को मुंबई में जॉब मिल गई तो दोनों वहीं आ गए। धीरे-धीरे वहां की भी आदत हो गई, हालांकि इस तरह अकेली वो कभी नहीं रही। पर अब सीख गई थी वो।

दोनों एक दुसरे को बेहतर समझ रहे थे, लड़ते थे, मनाते थे, अपनी जिम्मेदारियां समझने और निभाने की कोशिश कर रहे थे। और आज सबसे खास दिन था आरती के  लिए। मुंबई की पहली बारिश। लोग कहते हैं मुंबई की बारिश की बात ही कुछ और है। और आज उसने पहली बार महसूस किया की बारिश में अगर आपका प्यार आपके साथ न हो तो सब कैसे फीका फीका सा लगता है।

वो आज के दिन को यादगार बनाना चाहती थी ताकि जब भी मुंबई की पहली बारिश को याद करे तो एक मुस्कान होठों पे आ के बस रुक सी जाये। उसने ४ बजे ही नीरव को फ़ोन कर दिया था जल्दी घर आने को। नीरव के लाख पूछने पर भी उसने कारण नहीं बताया। फिर उसने नीरव की और अपनी पसंद का खाना बनाया। और अच्छे से तैयार हो कर उसका इंतजार करने लगी।

उधर नीरव से भी उसकी चह्चाहट छुपी नहीं थी। वो भी जल्दी-जल्दी सब काम निपटाने लगा। जैसे ही निकलने लगा तो बॉस ने अपने केबिन में बुला लिया।  अगले महीने के टार्गेट्स पे चर्चा करने के लिए। न चाहते हुए भी उसे बैठना पड़ा वहां।

उधर सजी सवंरी आरती धीरे-धीरे उदास होने लगी। फिर खुद को समझाते हुए उसने नीरव को कॉल किया जो उसने उठाया नहीं। दस दस मिनट के बाद उसने कॉल किया पर नीरव ने फिर नहीं उठाया। नीरव को बॉस के सामने फ़ोन उठाने में अजीब लगा क्योंकि उसे पता था कि फ़ोन रिसीव करते ही वो पूछेगी कि कब आ रहे हो।
आरती के तीन चार फ़ोन उसने काट दिए।

बड़ी मुश्किल से दो घंटे बाद वहां से निकला तो आरती को फ़ोन किया, पर गुस्से में आरती ने फ़ोन ही नहीं उठाया।

आरती को लगा नीरव को उसके गुस्से का पता चल गया होगा और जैसे ही दूसरी बार फ़ोन आएगा वो उठा लेगीनीरव ने सोचा था कि गाड़ी में बैठ कर उसे फ़ोन करेगा, लेकिन बारिश के कारण आज चारों तरफ जाम था। पांच मिनट की ड्राइव के बाद उसे १५-२० मिनट जाम में रहना पड़ता। इसी कारण वो आरती को फ़ोन कर ही नहीं पा रहा था।

बीच में फिर से परेशान आरती का फ़ोन आया तो ड्राइव करने के कारण उठा नहीं पाया और जब नीरव कॉल करने लगा तो फ़ोन की बैटरी ख़तम हो गई।

कही से कोई भी खबर न मिलने के कारण आरती की जान जैसे अधर में कहीं अटकी हुई थी,
पर नीरव को तो उसकी कोई फिकर ही नहीं थी। आने दो आज उसको, आज तो वो नीरव से बात ही नहीं करेगी। मन ही मन वो नीरव से नाराज़ भी हो गई और सोचने लगी कि जब तीन चार बार मनायेगा तब मानेगी।

कार चलाते हुए नीरव बार बार घडी की तरफ देख रहा था। एक तो जाम की टेंशन ऊपर से आरती के गुस्से की फिकर और यह फ़ोन तो किसी भी काम का नहीं है | आज जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तो...

जाने इस बॉस को भी आज ही टार्गेट पर चर्चा  क्यों करनी थी। वो उन सब बातों के बारे में सोच रहा था जिनको ले के आज दोनों में कहासुनी हो सकती थी। और वो आज लड़ना बिलकुल नहीं चाहता था।

अभी पिछले हफ्ते ही तो लेट आने को ले कर लड़ाई हुई थी दोनों की। और आज तो उसने सोचा था उसके टाइम के हिसाब से घर आ कर उसे खुश कर देगा और जाते हुए कोई गिफ्ट भी ले जायेगा पर इस भीड़ से पीछा छूटे तब न। अब तो उसे गुस्सा आने लग गया था।

घर पे गुस्से में आरती ने कपडे भी बदल लिए। पर अब तो ११ बजने वाले थे... कहाँ रह गया...

तभी बेल बजी। दरवाज़े पर नीरव था। "कहाँ थे तुम? मैं कब से तुम्हे फ़ोन कर रही थी। पर तुम पहले तो फ़ोन ही नही उठा रहे था फिर फ़ोन बंद कर के बैठ गए। पता है मैं कितनी परेशान हो रही थी। तुम्हे तो मेरी कभी फिकर ही नहीं रहती।" आरती एक ही सांस में सब कह गई।

जाम और काम  से परेशां नीरव ने कहा, "हाँ मुझे कोई फिकर नहीं है तुम्हारी। साला ५ घंटे भीड़ में फंस के आओ फिर घर आ के इन की चिक-चिक सुनो। आज तो बारिश ने सब कबाड़ा कर दिया। इस बारिश को भी आज ही होना था।"

"हाँ हाँ! अब तो मेरी बातें तुम्हें चिक-चिक ही लगेंगी। मैं ही पागल थी जो सुबह से लगी हुई थी। कुछ नहीं करूंगी आगे से। और हाँ, सारा कबाड़ा इस बारिश ने ही किया है," कहते हुए आरती बेडरूम में चली गई सोने। उसे लगा कोई गुस्से में भी कैसे बारिश को ऐसे कबाड़ा कह सकता है।

नीरव भी कपडे बदल कर लेट गया। एक ही बेड पे एक दुसरे की तरफ पीठ कर के लेते हुए थे। सोया कोई नहीं था दोनों में से पर कोई भी पहल करने को तैयार नहीं था। सुबह से थकी हुई आरती कब सो गई उसे खुद भी पता नहीं चला। और दोपहर से भूखे नीरव से जब रहा नहीं गया तो किचन में से कुछ खाने के लिए ढूँढने गया। वहां मटर पुलाव, पनीर, दाल मखनी और पूरी देख कर दंग रह गया। तो यह कारण था उसे घर जल्दी बुलाने का। और कैसे डांट दिया मैंने।

नीरव ने थोडा सा ले कर खाया और बाकी  फ्रिज में रख दिया। फिर देखा दुसरे कमरे में से कुछ महक सी आ रही है। वहां जा कर देखा तो मंद रौशनी, फूल और खुशबू से पूरा कमरा महक रहा था। नीरव अफ़सोस करता हुआ लेट गया।

सुबह आरती को उठने में थोड़ी देर हो गई। उठते ही लगा कल सब कुछ बाहर ही छोड़ दिया था, और नीरव के ऑफिस जाने का टाइम भी हो गया है। हे भगवान! सब जल्दी-जल्दी निपटाना होगा। वह फटाफट बाथरूम की तरफ भागी। जैसे ही  बाहर आई तो देखा नीरव एक ट्रे में दो कप चाय, सैंडविच और परांठे ले कर बेड पे उसका इंतजार कर रहा था।

"अरे मुझे उठाया क्यूँ  नहीं। तुम खाओ में लंच बना देती हूँ।" आरती जल्दी-जल्दी किचेन की तरफ जाने लगी।

नीरव ने उसे खीचते हुए अपनी गोद में ले लिया और बोला, "यह नाश्ता मेरे अकेले का नहीं है। आपका भी है मैडम।"

"पर लंच, ऑफिस, देर हो जाएगी न," आरती ने अपने आप को छुडवाने की नाकाम कोशिश की।

"चुप बिलकुल" नीरव ने उसे डाँटते हुए कहा, "आज मैंने ऑफिस से छुट्टी ली है। आप हमारे लिए इतना कर सकती हैं तो हम एक दिन तो आप के नाम कर ही सकते हैं।"

आरती के होठों पर हंसी आ गई।

बाहर तेज धूप थी पर पता नहीं क्यों आरती को कुछ बारिश का सा एहसास हो रहा था...

© उपमा डागा