खड़े-खड़े वो थक गई थी, तो कमरे में ही
टहलते टहलते कुर्सी पे जा के बैठ गई। पता नहीं आज घड़ी की सुईयां धीरे चल
रही थी या वो ज्यादा बैचैन थी।
वक़्त था कि कट ही नहीं रहा था। उसने
चार बजे नीरव को फ़ोन किया था कि प्लीज़ आज घर जल्दी आ जाना और इस समय रात
के १० बज गए थे और अभी तक उसका कुछ पता नहीं था। धीरे-धीरे गुस्सा चिंता
में बदलता जा रहा था।
बचपन से ही आरती को बारिश बहुत अच्छी लगती थी। ऐसा लगता था मानो भगवान
ने सारे ग़म, चिंता भुलाने के लिए ही इस मौसम को बनाया है। बारिश के आते ही
वो बस चहकने सी लगती।
पकौड़े, पुए और कितने ही पकवानों की वो माँ से
फरमाइश करती और बारिश में खूब भीगती। उसकी तो जैसे मस्ती दुगनी हो जाती।
माँ बीच-बीच में ज्यादा भींगने से मना करती, बीमार होने का डर उसे सताने
लगता। इस पर पिता जी कहते, "करने दो उसे मस्ती। यह भोलापन और उछलकूद देखने
को बाद में हम तरस जायेंगे।" पहले उसे इसका मतलब तो समझ में नहीं आया पर
पिता जी की इजाजत मिलना उसके लिए काफी था।
अब उसे पिता जी की उन बातों का मतलब समझ में आ गया था शायद। शादी के
बाद एक संयुकत परिवार में गई थी वो। बहुएं कैसे रहती हैं यह उसे पहले कुछ
दिनों में ही समझ आ गया था। मस्ती उसे पसंद थी पर रिश्ते निभाते माँ को
देखा था और शायद देखते देखते सीख भी गई थी।
तीन सालों बाद नीरव को मुंबई में जॉब मिल गई तो दोनों वहीं आ गए।
धीरे-धीरे वहां की भी आदत हो गई, हालांकि इस तरह अकेली वो कभी नहीं रही। पर
अब सीख गई थी वो।
दोनों एक दुसरे को बेहतर समझ रहे थे, लड़ते थे,
मनाते थे, अपनी जिम्मेदारियां समझने और निभाने की कोशिश कर रहे थे। और आज
सबसे खास दिन था आरती के लिए। मुंबई की पहली बारिश। लोग कहते हैं मुंबई की
बारिश की बात ही कुछ और है। और आज उसने पहली बार महसूस किया की बारिश में
अगर आपका प्यार आपके साथ न हो तो सब कैसे फीका फीका सा लगता है।
वो आज के दिन को यादगार बनाना चाहती थी ताकि जब भी मुंबई की पहली बारिश
को याद करे तो एक मुस्कान होठों पे आ के बस रुक सी जाये। उसने ४ बजे ही
नीरव को फ़ोन कर दिया था जल्दी घर आने को। नीरव के लाख पूछने पर भी उसने
कारण नहीं बताया। फिर उसने नीरव की और अपनी पसंद का खाना बनाया। और अच्छे
से तैयार हो कर उसका इंतजार करने लगी।
उधर नीरव से भी उसकी चह्चाहट छुपी नहीं थी। वो भी जल्दी-जल्दी सब काम
निपटाने लगा। जैसे ही निकलने लगा तो बॉस ने अपने केबिन में बुला लिया।
अगले महीने के टार्गेट्स पे चर्चा करने के लिए। न चाहते हुए भी उसे बैठना
पड़ा वहां।
उधर सजी सवंरी आरती धीरे-धीरे
उदास होने लगी। फिर खुद को
समझाते हुए उसने नीरव को कॉल किया जो उसने उठाया नहीं। दस दस मिनट के बाद
उसने कॉल किया पर नीरव ने फिर नहीं उठाया। नीरव को बॉस के सामने फ़ोन उठाने
में अजीब लगा क्योंकि उसे पता था कि फ़ोन रिसीव करते ही वो पूछेगी कि कब आ
रहे हो। आरती के तीन चार फ़ोन उसने काट दिए।
बड़ी मुश्किल से दो घंटे बाद वहां से निकला तो आरती को फ़ोन किया, पर गुस्से में आरती ने फ़ोन ही नहीं उठाया।
आरती को लगा नीरव को उसके गुस्से का पता चल गया होगा और जैसे ही दूसरी बार फ़ोन आएगा वो उठा लेगी। नीरव ने सोचा था कि गाड़ी में बैठ कर उसे फ़ोन करेगा, लेकिन बारिश
के कारण आज चारों तरफ जाम था। पांच मिनट की ड्राइव के बाद उसे १५-२० मिनट
जाम में रहना पड़ता। इसी कारण वो आरती को फ़ोन कर ही नहीं पा रहा था।
बीच में फिर से परेशान आरती का फ़ोन आया तो ड्राइव करने के कारण उठा
नहीं पाया और जब नीरव कॉल करने लगा तो फ़ोन की बैटरी ख़तम हो गई।
कही से कोई भी खबर न मिलने के कारण आरती की जान जैसे अधर में कहीं अटकी हुई थी, पर नीरव को तो
उसकी कोई फिकर ही नहीं थी। आने दो आज उसको, आज तो वो नीरव से बात ही नहीं
करेगी। मन ही मन वो नीरव से नाराज़ भी हो गई और सोचने लगी कि जब तीन चार बार
मनायेगा तब मानेगी।
कार चलाते हुए नीरव बार बार घडी की तरफ
देख रहा था। एक तो जाम की टेंशन ऊपर से आरती के गुस्से की फिकर और यह फ़ोन
तो किसी भी काम का नहीं है | आज जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तो...
जाने
इस बॉस को भी आज ही टार्गेट पर चर्चा क्यों करनी थी। वो उन सब बातों के
बारे में सोच रहा था जिनको ले के आज दोनों में कहासुनी हो सकती थी। और वो
आज लड़ना बिलकुल नहीं चाहता था।
अभी पिछले हफ्ते ही तो लेट आने को ले कर लड़ाई हुई थी दोनों की। और आज
तो उसने सोचा था उसके टाइम के हिसाब से घर आ कर उसे खुश कर देगा और जाते
हुए कोई गिफ्ट भी ले जायेगा पर इस भीड़ से पीछा छूटे तब न। अब तो उसे गुस्सा
आने लग गया था।
घर पे गुस्से में आरती ने कपडे भी बदल लिए। पर अब तो ११ बजने वाले थे... कहाँ रह गया...
तभी
बेल बजी। दरवाज़े पर नीरव था। "कहाँ थे तुम? मैं कब से तुम्हे फ़ोन कर रही
थी। पर तुम पहले तो फ़ोन ही नही उठा रहे था फिर फ़ोन बंद कर के बैठ गए। पता
है मैं कितनी परेशान हो रही थी। तुम्हे तो मेरी कभी फिकर ही नहीं रहती।"
आरती एक ही सांस में सब कह गई।
जाम और काम से परेशां नीरव ने कहा, "हाँ मुझे कोई फिकर नहीं है
तुम्हारी। साला ५ घंटे भीड़ में फंस के आओ फिर घर आ के इन की चिक-चिक सुनो।
आज तो बारिश ने सब कबाड़ा कर दिया। इस बारिश को भी आज ही होना था।"
"हाँ हाँ! अब तो मेरी बातें तुम्हें चिक-चिक ही लगेंगी। मैं ही पागल थी जो
सुबह से लगी हुई थी। कुछ नहीं करूंगी आगे से। और हाँ, सारा कबाड़ा इस बारिश
ने ही किया है," कहते हुए आरती बेडरूम में चली गई सोने। उसे लगा कोई गुस्से
में भी कैसे बारिश को ऐसे कबाड़ा कह सकता है।
नीरव भी कपडे बदल कर लेट गया। एक ही बेड पे एक दुसरे की तरफ पीठ कर के
लेते हुए थे। सोया कोई नहीं था दोनों में से पर कोई भी पहल करने को तैयार
नहीं था। सुबह से थकी हुई आरती कब सो गई उसे खुद भी पता नहीं चला। और दोपहर
से भूखे नीरव से जब रहा नहीं गया तो किचन में से कुछ खाने के लिए ढूँढने
गया। वहां मटर पुलाव, पनीर, दाल मखनी और पूरी देख कर दंग रह गया। तो यह
कारण था उसे घर जल्दी बुलाने का। और कैसे डांट दिया मैंने।
नीरव ने थोडा सा ले कर खाया और बाकी फ्रिज में रख दिया। फिर देखा
दुसरे कमरे में से कुछ महक सी आ रही है। वहां जा कर देखा तो मंद रौशनी, फूल
और खुशबू से पूरा कमरा महक रहा था। नीरव अफ़सोस करता हुआ लेट गया।
सुबह
आरती को उठने में थोड़ी देर हो गई। उठते ही लगा कल सब कुछ बाहर ही छोड़ दिया
था, और नीरव के ऑफिस जाने का टाइम भी हो गया है। हे भगवान! सब जल्दी-जल्दी
निपटाना होगा। वह फटाफट बाथरूम की तरफ भागी। जैसे ही बाहर आई तो देखा
नीरव एक ट्रे में दो कप चाय, सैंडविच और परांठे ले कर बेड पे उसका इंतजार
कर रहा था।
"अरे मुझे उठाया क्यूँ नहीं। तुम खाओ में लंच बना देती हूँ।" आरती जल्दी-जल्दी किचेन की तरफ जाने लगी।
नीरव ने उसे खीचते हुए अपनी गोद में ले लिया और बोला, "यह नाश्ता मेरे अकेले का नहीं है। आपका भी है मैडम।"
"पर लंच, ऑफिस, देर हो जाएगी न," आरती ने अपने आप को छुडवाने की नाकाम कोशिश की।
"चुप
बिलकुल" नीरव ने उसे डाँटते हुए कहा, "आज मैंने ऑफिस से छुट्टी ली है। आप
हमारे लिए इतना कर सकती हैं तो हम एक दिन तो आप के नाम कर ही सकते हैं।"
आरती के होठों पर हंसी आ गई।
बाहर तेज धूप थी पर पता नहीं क्यों आरती को कुछ बारिश का सा एहसास हो रहा था...
© उपमा डागा
We all know in our mind that there is a time that we can set aside. When we had stopped reading daily Magazines, Short stories,Newspaper stories,Comics,Cartoon Series,Poems is Time Immemorial.
जवाब देंहटाएंI have booked my time slots to read your blog now.