आज सुबह से ही निर्मला बहुत व्यस्त
थी। बाजार, घर का काम करते करते थक गई थी वो। पाँच मिनट बैठती थी एक कप चाय
पीने को, फिर काम में लग जाती। क्यों न हो, आखिर उसका बेटा पूरे डेढ़ साल
बाद उससे मिलने आ रहा था। निर्मला का बेटा - राजेश।
राजेश के बारे में सोचने से ही उसके चेहरे पे ममतामयी मुस्कान आ जाती। शुरू से ही थोडा शर्मीला था, पर बच्चों की बात समझने के लिए माँ को कभी शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। उसके भाव से वो समझ जाती कि अब उसे कुछ चाहिए या कुछ कहना है। फिर प्यार से गोद में बिठाती और पूछती, "मेरे राजू को कुछ चाहिए?" वो धीरे से सर हिला देता और निर्मला अलादीन के जिन्न की तरह उसकी हर इच्छा पूरी कर देती।
घी गरम करके उसने धीमी आंच पर ही गाजर को भूनना शुरू किया। निर्मला को याद आया कि कैसे बचपन में, जैसे ही स्कूल से आ के राजू को पता चलता था कि आज गाजर का हलवा बना है, तो वह खाने की जगह हलवा ही खाता। मन भर के। राजू का मन भरता और निर्मला को लगता उसका पेट भर गया। फिर तो आते जाते दो चार चम्मच खाता रहता।
राजेश के बारे में सोचने से ही उसके चेहरे पे ममतामयी मुस्कान आ जाती। शुरू से ही थोडा शर्मीला था, पर बच्चों की बात समझने के लिए माँ को कभी शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। उसके भाव से वो समझ जाती कि अब उसे कुछ चाहिए या कुछ कहना है। फिर प्यार से गोद में बिठाती और पूछती, "मेरे राजू को कुछ चाहिए?" वो धीरे से सर हिला देता और निर्मला अलादीन के जिन्न की तरह उसकी हर इच्छा पूरी कर देती।
फलैश बैक से निकल कर
निर्मला उठी और उसने कड़ाही गैस पर चढ़ा दी। बस डेढ़ घंटा और। अरे राजू के आने
में नहीं, वो तो शाम को आएगा। उसके मनपसंद गाजर के हलवे को बनने में। घी,
कद्दूकस की हुई गाजरें, चीनी, खोया और ढेर सारे मेवे। सब चीज़ें उसने एक जगह
पर इक्कठी कर ली थी।
घी गरम करके उसने धीमी आंच पर ही गाजर को भूनना शुरू किया। निर्मला को याद आया कि कैसे बचपन में, जैसे ही स्कूल से आ के राजू को पता चलता था कि आज गाजर का हलवा बना है, तो वह खाने की जगह हलवा ही खाता। मन भर के। राजू का मन भरता और निर्मला को लगता उसका पेट भर गया। फिर तो आते जाते दो चार चम्मच खाता रहता।
"बिलकुल पागल था हलवे के पीछे," निर्मला ने मुस्कुराते हुए मानों खुद को ही कहा हो। और चीनी डाल के फिर से भूनना शुरू कर दिया। पूरे पौने
दो घंटे लगे निर्मला को गाजर का हलवा बनाने में। बाजुओं ने बिलकुल ही जवाब
दे दिया था। वो निढाल सी हो के बिस्तर पे बैठ गई। उसे धयान आया कि सुबह से
उसने कुछ
खाया ही नहीं है। सिर्फ तीन बार चाय ही पी है। तभी उसे इतनी कमजोरी लग रही
थी। पर अब मन नहीं था कुछ बनाने का। एक बार मन हुआ कि थोड़ा सा हलवा ही खा
ले। फिर लगा नहीं पहले राजू को चखाएगी तभी तो उसकी मेहनत सफल होगी... जब वो
और माँगेगा।
पर रोटी बनाने
की इच्छा नहीं थी। देखा तो फ्रिज में दो पीस ब्रेड के रखे थे। बस वही खा
लिए। किसी के लिए खाना बनाना जहाँ उसे तृप्ति देता था, अपने लिए कुछ भी
बनाना उसके लिए बस सिरदर्दी होती थी।
ब्रेड खा के
निर्मला थोड़ी देर लेट गई। शायद बुढ़ापे के कारण ज्यादा काम करने से थकान हो
गई थी। वो कब सो गई पता ही नहीं चला। शाम को कॉल-बेल की तेज आवाज़ सुन के
उसकी आँख खुली। "अरे! इतनी देर हो गई। लाइट भी नहीं जलाई। पता नहीं राजू
कहाँ पहुंचा होगा।" सब एक साथ बोलते हुए वो बिस्तर से उठी दरवाज़ा खोलने।
"क्या माँ? कब
से बेल बजा रहा हूँ। तुम्हें पता भी था मैं आ रहा हूँ फिर भी ऐसे सो रही
हो। कोई चिंता ही नहीं है। इतना लम्बा सफ़र... उफ़!" कहता हुआ राजेश माँ के
पैर छूने की रस्म अदा करता हुआ अन्दर चला गया।
निर्मला वहीं खड़ी रही सारे आशीर्वाद मुँह में लिए हुए। फिर अन्दर आते हुए, दरवाज़ा बंद करते-करते निर्मला ने अफ़सोस भाव से कहा मानो अपनी सफाई दे रही हो, "पता नहीं बेटा कैसे आँख लग गई। मैं तो इस समय कभी सोती भी नहीं। बहुत देर से बेल बजा रहे थे क्या?"
"चलो छोड़ो। जो हो गया सो हो गया।"
"चलो छोड़ो। जो हो गया सो हो गया।"
निर्मला रसोई में चली गई, पानी लेने। पानी का गिलास पकड़ाते हुए बोली," कोई दिक्कत तो नहीं हुई सफ़र में?"
"नहीं सब ठीक था," राजेश ने पानी पीते हुए, थोड़ा शांत होते हुए कहा।
"घर में बहू, सौम्या, रचित सब ठीक हैं?'
"सब ठीक हैं माँ। मैं जरा फ्रेश हो के आता हूँ," राजेश ने उठते हुए कहा।
"जा बेटा। चाय चढ़ाऊ क्या?" निर्मला ने पूछा।
"हाँ माँ।"
निर्मला किचन में चाय चढ़ाते
हुए सोचने लगी पता नहीं इन मरी गाजरों में आजकल कितनी खाद डालने लगे हैं।
पहले तो इसी हलवे की इतनी खुशबू आती थी कि घर में घुसते ही राजू को पता चल जाता था कि आज गाजर का हलवा बना है।
चाय के साथ बिस्किट और नमकीन ले कर निर्मला कमरे में गई। चाय का कप हाथ में ले कर राजेश
ने माँ का, पड़ोसियों का, रिश्तेदारों का हाल चाल पूछा। निर्मला के पास तो
बातों का ढेर था। पर फिलहाल उन्हीं सवालों के जवाब दिए जो उसने पूछे थे।
चाय खत्म कर के राजेश ने कहा, "कल मेरी मीटिंग है, यहीं होटल में। तो मुझे
थोड़ी सी तैयारी करनी है।"
"ठीक है राजू। बस इतना बता दे कौन सी सब्जी खायेगा? दम आलू, पनीर या फिर तेरा स्पेशल भर्ता," माँ ने लाड़ से पूछा।
"अरे नहीं माँ। इतना हैवी कुछ नहीं खाऊंगा। दम आलू में तो बहुत आयल होगा। कुछ भी हल्का सा बना लो," राजेश ने लैपटॉप खोलते हुए कहा।
अच्छा। हल्का सा। उसने फटाफट दाल और बीन्स आलू चढ़ा दिए।
दो घंटे बाद
राजेश का काम ख़तम हुआ। निर्मला को जोर से भूख लगी हुई थी, पर बेटे के बगैर
कैसे खाती तो बस चार पाँच बार दरवाज़े से देख कर आ गई और इंतजार करती रही
उसके काम के खत्म होने का।
माँ ने दाल,
सब्जी परोसी और घी से चुपड़ी नरम सी रोटी निकाल कर प्लेट में रखी और अपनी
थाली भी लगाने लगी। "यह क्या माँ। आपने रोटी में घी लगा दिया। मैं तो आजकल
खुशक फुल्का लेता हूँ। चलो अब कल मत लगाना।"
निर्मला को याद
आया कैसे दो-दो बार घी लगवा के रोटी बिना सब्जी के खा जाता था और कहता था,
"माँ! आप तो मुझे ऐसे ही रोटी दे दिया करो। आपकी रोटी तो इतनी नरम होती है
कि सब्जी की भी जरूरत नहीं पड़ती।"
खैर दोनों खाना
खाने लगे। सब्जी खाते हुए बोला, "माँ! रीता तो अब बेक्ड सब्जियां बनाती है।
आप आओगी न तो मैं बेक्ड बीन्स बनवाऊंगा। बिलकुल फैट नहीं होता। देखो,
मैंने दो महीने में तीन किलो वज़न कम किया है।"
"हाँ। कुछ कमजोर सा तो लग रह है बेटा," निर्मला ने उसे गौर से देखते हुए कहा।
"कमजोर नहीं माँ... फिट," राजेश ने हँसते हुए कहा। निर्मला बस मुस्कुरा दी। खाने के बाद वो दो प्लेटों में हलवा ले आई। लगा देख के ही वो चिल्ला देगा।
हलवा देख कर राजेश ने कहा, "अरे वाह! गाजर का हलवा!"
हलवा देख कर राजेश ने कहा, "अरे वाह! गाजर का हलवा!"
निर्मला को लगा चलो उसकी बनाई कोई चीज़ तो पास हुई। वो प्यार से उसे निहारने लगी।
"पर माँ इतना
नहीं खाऊंगा। बस दो चम्मच। मैंने तो मीठा खाना बिलकुल बंद कर दिया हुआ है।
पर आपके हाथ का हलवा छोड़ नहीं सकता," कहते हुए उसने दो चम्मच हलवा एक कटोरी
में निकाल लिया।
और निर्मला को अचानक लगा वो बहुत थक गई है।
© उपमा डागा २०१२
© उपमा डागा २०१२
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