नमिता आज सफाई के मूड में थी। कहाँ से शुरू करे बस यही सोच रही थी।
कमरे में तो बस मिटटी थी जो झाड़ने से साफ़ हो जाती पर उस की अलमारी एक अरसे से मानों उसका इंतजार कर रही थी कि कभी तो नमिता उसकी सुध लेगी। अलमारी की शिकायत भी उसके मन की तरह थी। फिलहाल उसे लगा कि ज्यादा जरूरत अलमारी को थी।
नमिता एक-एक कर अलमारी में से चीजें निकलने लगी। थोड़ी देर में पूरी अलमारी बेड पर थी। और उसमें कपड़े कम, कागज, डायरी, पत्र और कार्ड ही ज्यादा थे।
"उफ़," नमिता के मुँह से निकला।
"पता नहीं क्या कुछ इकठ्ठा कर के रखा है? इन सारे फालतू कागजों से तो मैं आज छुटकारा पा कर ही दम लूंगी," नमिता ने खुद को डांटते हुए कहा।
पहले कपड़ों की दोबारा तह लगाते हुए उसने उनको करीने से अन्दर रखा। अब बचा उसका खज़ाना। इसको समेटने के लिए तो समय चाहिए था। तो वह बिस्तर पर इन सब के बीच बैठ गई।
एक ढेर में सिर्फ चिठ्ठियाँ थी। नमिता ने बड़े प्यार से चिठ्ठियों पर हाथ फेरा। मानों अपने अतीत को सहला रही हो। सच कितना शौक था उसे चिठ्ठियाँ लिखने का। बड़े मन से लिखती थी वो। मानों अपने भाव, अपना प्यार, अपने विचार किसी अपने तक पहुँचाने का चिठ्ठी से अच्छा कोई साधन हो ही नहीं सकता।
पहली चिठ्ठी उसके हाथ में किरण की आई। किरण—उसकी पाँचवी कक्षा की सहेली। नमिता को याद आया कि अक्सर गर्मियों की छुट्टियों में मुंबई जाया करती थी, जहाँ उसके ननिहाल और ददिहाल दोनों थे। बस उन्हीं दिनों उसे किरण की चिठ्ठियाँ मिला करती थी।
चिठ्ठी क्या थी छुट्टियों की पूरी दिनचर्या थी। उसने छुट्टियों में क्या किया और क्या करेगी। नमिता हमेशा डांटती थी किरण को कि क्या चिठ्ठी में सारे दिन का लेखा-जोखा भर देती हो। कभी दिल से भी लिखा करो। इस पर किरण हंस के जवाब देती कि उसे नमिता जैसे चिठ्ठी नहीं लिखनी आती। फिर नमिता हँसते हुए उसे कहती कि भाव डाला करो उसमें अक्षर नहीं। तो किरण सर मारते हुए कहती अब इतने भाव नहीं है उसके पास।
एक मुस्कान आ गई उसके चेहरे पर। चिट्ठी पढ़ के और किरण को याद करके। पता नहीं कहाँ होगी वो... ऐसी ही ७-८ चिट्ठियां थी उसकी।
फिर मुग्धा की चिट्ठी हाथ में आई। मुग्धा नवीं कक्षा में नमिता की क्लास में आई थी, सेशन के बीच में। तो मैडम ने मुग्धा का छूटा हुआ काम पूरा करवाने की जिम्मेदारी नमिता को दी थी। उसी का धन्यावाद पत्र।
मुग्धा की बहुत मदद की थी नमिता ने। लेकिन एक बार जब नमिता बीमार पड़ी तो काम पूरा करने के लिए मुग्धा ने अपनी कॉपी देने से साफ़ इंकार कर दिया। परीक्षाएं नज़दीक ही थी और इस बार उसे मदद की जरूरत थी। उसे मुग्धा का व्यवहार समझ में नहीं आया। फिर कक्षा के कुछ बच्चों ने बताया कि वो सभी को यह कहती फिर रही थी कि इस बार वो टॉप करेगी, नमिता नहीं। पर टीचर्स और बाकी बच्चों की मदद से काम पूरा करके उसने पहली पोज़ीशन हासिल कर ली थी।
और मुग्धा ने उसे फिर एक चिठ्ठी लिखी थी। जिसमे सिर्फ सफाई और छोटी सी माफ़ी थी।
"मुग्धा! तुमने मुझे छोटी सी उम्र में ही जिन्दगी से रूबरू करवाने की कितनी कोशिश की थी। पर मैं भी न ..."
नमिता मानों मुग्धा की दी हुई सीख को आज के माहौल में फिट करने की कोशिश कर रही थी। यही तो होता है आजकल। किसी का हाथ पकड़ कर एक ऊंचाई तक पहुँचो फिर उसी ऊंचाई पर अपना हक ज़माने के लिए उसे ही धक्का दे दो जो आप को वहाँ तक लाया है। लेकिन ऊंचाई पर चढ़ने की यह कोशिश या रास्ता उसे कभी भी समझ में नहीं आया। न तब, न अब। और भी दो तीन चिठ्ठियाँ थी उसकी। पर नमिता ने उन्हें बिना खोले ही उनको अलग कर दिया।
"अरे नीरू मैडम की चिठ्ठी!"
नीरू मैडम उसके स्कूल में बी एड की ट्रेनिंग पर आई थी। उनसे उसकी इतनी अच्छी बनने लगी थी कि जाते समय उन्होंने उसे अपने घर का पता भी दिया और चिठ्ठी लिखने का वादा भी। बस फिर तो चिठ्ठियों का दौर शुरू हो गया। पहले आपस की, परिवार की, एक दुसरे के बारे में जानने की बातें। अचानक एक दिन पता चला उनकी शादी हो गई। वो नाराज तो बहुत हुई कि उन्होंने शादी में नमिता को नहीं बुलाया।
नमिता नीरू मैडम पर एक हक समझने लग गई थी—एक छोटी बहिन का हक। लेकिन नीरू मैडम ने बताया कि सब कुछ इतनी जल्दी-जल्दी हुआ कि कुछ पता ही नहीं चला। लड़के वाले देखने आये और शादी कर के ले गए। नमिता को बहुत ख़ुशी हुई। पर धीरे-धीरे पत्रों का सिलसिला कम हो गया, फिर अचानक बंद।
एक खुबसूरत सा रिश्ता जब अचानक ख़त्म होता है तो कुछ तकलीफ तो होती है। पर कितनी हुई थी उस समय, यह अब नमिता को ठीक से याद नहीं था, पर हुई जरूर थी।
"यह लिखावट किसकी है?" नमिता ने मानों खुद से पूछा।
कॉलेज कैंप से जब वो लोग मनाली गए थे, तो वहां एक और कॉलेज की लड़कियों से दोस्ती हो गई थी। उसी में से एक, रीना की चिठ्ठी थी। बड़ी ही रस्मी। सवालों से भरी। मानों पहली बार में ही सब कुछ जान लेना चाहती हो। और जहाँ तक नमिता को याद था उसने या तो इस चिठ्ठी का जवाब नहीं दिया या लिख के पोस्ट नहीं किया।
और भी कई चिठ्ठियाँ थी—उसके रिश्तेदारों की, नौकरी के लिए अर्जी वाली चिठ्ठियों की कॉपी भी उसने संभाल कर रखी थी।
फिर एक लिखावट देख कर उसकी आँखों में प्यार छलकने लगा।
"मम्मी," वो इतना ही कह पाई।
नमिता के हॉस्टल में आने के बाद बहुत ज्यादा तो नहीं पर कुछ चिठ्ठियाँ तो लिखी थी मम्मी ने। किसी में हिदायतों से शुरू कर, प्यार पर ख़त्म करती, तो किसी में प्यार से शुरू कर हिदायतों पर ख़त्म करती। "मम्मी! आप कभी नहीं बदलोगी। शायद आज भी आप चिठ्ठी लिखो तो ऐसी ही लिखोगी। प्यार, चिंता और सुझावों का संगम—मेरी माँ।"
फिर एक ढेर आया हाथ में। बड़ी प्यारी सी लिखावट का। पहचानने में समय नहीं लगा उसे। पर वह चाह कर भी उनको पढ़ नहीं पाई। शब्द अभी भी उनमें वही होंगे जो पहले थे। पर पहले उसने जैसे उन चिठ्ठियों को पढ़ा था, वैसे वो अब नहीं पढ़ पाएगी। इसलिए नमिता ने जैसे उन्हें उठाया था, वैसे ही वापिस रख दिया। अतीत के उस सफ़र पर दोबारा जाने की हिम्मत या इच्छा नमिता की नहीं थी। वो ढेर एक तरफ रखते हुए पता नहीं क्यों एक ठंडी सी साँस निकली उसके अन्दर से।
फिर एक पुलिंदा तो नहीं, हाँ ४-५ चिठ्ठियाँ थी अभिनव की। जो कभी-कभार उसके मायके जाने पर उसने लिखी थी। सारी चिठ्ठियाँ पढ़ कर उसे हँसी आ गई। क्योंकि अगर १-२ लाइन हटा दी जाए तो सारी चिठ्ठियों का मजमून एक ही था। कैसी हो? घर में सब कैसे हैं? अपना और बच्चों का ध्यान रखना। वगैरह वगैरह। उसने हँसते हुए बंडल साइड में रख दिया।
अब बस एक बंडल बचा था—उन चिठ्ठियों का जो उसने अलग-अलग टाइम में अलग-अलग लोगों को लिखी थी। पर शब्दों को पिरोने में शायद इतना समय लगा दिया कि उनके पहुँचने का औचित्य ही ख़त्म हो गया। और वो पत्र उसी के पास रह गए उसकी धरोहर बन कर।
ऐसा ही एक ढेर कार्ड्स का भी था। पर आज वो इतनी बार भावनाओं के समंदर में गोते लगा चुकी थी कि थक गई थी। अब उसमें और शक्ति नहीं थी।
हर बार यही होता है। वो सब कुछ ले कर बैठती है कि इन सब को नहीं रखेगी अब अपने पास। पर हर बार कागज, चिठ्ठी, डायरी और कार्ड्स में से एक चीज़ खोलती और बस गुजरी हुई जिन्दगी का एक चक्कर लगाती, कुछ भूली सी बातें याद करती और फिर उनको ज्यूँ का त्यूँ रख देती। पता नहीं क्यूँ?
पता नहीं इन सब में उसने क्या सहेज कर रखा था। अपनी निकल चुकी आधी जिंदगी या आधी-आधी कितनी कहानियां... बिना किसी अंत के।
© उपमा डागा २०१२
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