शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

काश मम्मी

घर के दरवाज़े तक पहुँचने से पहले ही उसने अपने कोट की जेब से घर की चाभी निकाली और तीन बार घुमाते हुए ताला खोला। स्कूल बैग सोफे पर पटक कर वो बाथरूम की तरफ भागी और वियान स्कूल बैग के साथ टीवी वाले कमरे में।

बाथरूम में परी कितनी देर रोती रही, शायद आधा घंटा। पर कोई भी नहीं था उसे चुप करवाने वाला। उसने रोते-रोते सोचा मम्मी काश आप घर पे होती।

मम्मी पापा ऑफिस में थे और छोटा भाई वियान, उसे तो कभी परी की परवाह हुई ही नहीं। जब देखो लड़ता रहता है।

वो मुंह हाथ धो कर टीवी वाले कमरे में गई। टीवी पर कोई कार्टून फ़िल्म चल रही थी। वियान कभी बैठे-बैठे हंसने लगता तो कभी बिस्तर पर उछलने लगता। परी भी साथ ही बैठ गई। उदास चेहरे पर थोड़ी तो मुस्कान आई, पर पूरी तरह नहीं। इतने में वियान ने कहा दीदी खाना ले आओ। भूख लगी है।

"पहले यूनिफार्म बदलो।" परी ने दीदी होने के कारण उसको बोला, चाहे उसे खुद भी अभी कपड़े बदलने थे।

पर वियान अभी बात मानने के मूड में नहीं था और यह बात बढ़ते-बढ़ते लड़ाई में बदल गई। अंत में परी पैर पटकते हुए खाना गरम करने चली गई। उसके जाने के बाद  वियान ने भी चुपचाप कपड़े बदल लिए। और मुंह बना के फिर टीवी के आगे बैठ गया। परी माइक्रोवेव के आगे खड़ी गुस्से से लाल पीली हो रही थी।

"पता नहीं हर कोई उसी पे क्यों रौब डालता है? फिर चाहे वो मम्मी, पापा हो, टीचर हो, दोस्त हो या यह टिंगू सा वियान। कोई भी उसे समझता क्यों नहीं है।"

स्कूल से आ कर यह घर उसे काटने को दौड़ता। कोई बात करने को नहीं। स्कूल की बातें, उसकी बातें सुनने वाला कोई नहीं। और वियान… उसको तो कुछ बोलना न बोलना बराबर था।

काश! मम्मी पहले की तरह घर पर होती। अपने हाथों से गरम-गरम खाना बना कर देती। उसकी बातें सुनती। पर…

खाना गरम हो गया था। वो दोनों के लिए खाना ले कर कमरे में चली गई। एक प्लेट वियान के आगे खिसका दी। एक से खुद खाने लगी। पर वियान तो अभी भी गुस्से में था। फिर उसने चुपचाप उसके मुंह में भी कौर दे दिया। भूख तो उसे भी लगी हुई थी, तो उसने भी चुपचाप खाना शुरू कर दिया। टीवी एक दोस्त या अभिभावक की भूमिका निभा रहा था। खाना खा कर भी दोनों बड़ी देर तक टीवी के आगे ही बैठे रहे। अचानक फ़ोन की घंटी बजी। रोज की तरह इस समय मम्मी ही फ़ोन कर रही होगी, यह सोच कर वियान ने फटाफट टीवी बंद कर दिया।
वह बैग की तरफ भागा और परी फ़ोन की तरफ। मानों मम्मी फ़ोन से निकल कर बाहर आ जाएगी।  

"क्या हो रहा है ?"

"बस अभी खाना खाया। "

"इतनी लेट क्यों ?"

परी ने वियान की तरफ देखा, मानों पूछ रही हो ले दूं तुम्हारा नाम? फिर बोली, "थोड़ी मस्ती कर रहे थे। "

"हूँ। मस्ती थोड़ी कम करो अब। एग्जाम आने वाले हैं," मम्मी बोली। फिर थोडा रुक कर बोली, "और वियान क्या कर रहा है?"

"पढ़ने बैठने लगा है।"

"उसको बोलो अब बैठ जाए और तुम भी अब काम कर लो।"

"अच्छा मम्मी," परी बोली।

"और हाँ, वाशिंग मशीन में कपड़े रखे हैं, सुखा देना।"

"अं… हूँ। नहीं मम्मी…"

"ठीक है। रहने दो। सब कुछ मैं ही कर लूँगी," मम्मी की आवाज़ थोड़ी तेज हो गई।

परी को लगा मम्मी गुस्सा हो गई। तो साथ ही मनाने वाले अंदाज़ में बोली, "मैं तो कर रही थी
… आप तो मज़ाक भी नहीं समझती।"

"चलो अब बाद में बात करती हूँ," मम्मी बोली और फ़ोन रख दिया।

मम्मी के पास तो बात करने के लिए दस मिनट की भी फुर्सत नहीं है।

साल भी तो नहीं हुआ अभी इस बात को। मम्मी पापा कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। जब पापा ने मम्मी को बताया था कि उनकी नौकरी अब नहीं रही और उसके बाद मम्मी को जो भी पहला जॉब ऑफर मिला उन्होंने ले लिया ताकि इस मुश्किल घड़ी से निकलने की सब मिल-जुल कर कोशिश कर सके। उस समय मम्मी पापा ने उन दोनों को भी बिठा कर सारी बात समझाई थी।

इस बीच में पापा कभी घर पर कुछ काम कर रहे होते तो कभी कुछ काम के सिलसिले से बाहर जाते और मम्मी रोज ही। उस समय उनका बाहर आना जाना, घूमना फिरना काफी कम हो गया था पर फिर भी सब एक दूसरे के साथ थे।

हालात धीरे-धीरे बेहतर, फिर ठीक हो गए। दो महीने पहले पापा की नौकरी लग गई। उस दिन कितने खुश थे सब। पिज़्ज़ा मंगवाया, फिर बाहर आइसक्रीम खाने भी गए। वियान ने कैसे उस समय पूछा था, "पापा! अब तो हम मॉल जा सकते हैं ना?"

और मम्मी पापा हंस पड़े थे। पर बाद में उसने मम्मी को पापा का हाथ दबाते हुए देखा था। वियान के इस इमोशनल से सवाल पर पापा ने बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोके थे। पर उसने यह सब देख लिया था।

आज कितने महीने हो गए हैं यूं ही स्कूल से आ कर अकेले घर में घुसते।

आज तो स्कूल में उसकी निधि और सुमेधा से खूब लड़ाई हुई। जब भी निधि को कोई काम होता तो उसके पास पहुँच जाती वर्ना सुमेधा सुमेधा ही करती रहती है। और वो पता नहीं किस बात का इतना इतना घमंड है उसको। कभी-कभी मन करता कि स्कूल ही बदल ले। पर स्कूल बदलने पर वहाँ भी ऐसे ही दोस्त मिले तो ?

पर आज तो। निधि और सुमेधा से ज्यादा उसे तन्मय और शंशाक पर गुस्सा आ रहा था। क्लास में हर कोई उसे तन्मय का नाम ले कर चिढ़ाने लगा है। तंग आ गई है वो सबको चुप करवाते करवाते। अब तो उसने कुछ कहना भी छोड़ दिया है।

सबसे ज्यादा तो यह शशांक। आज तो वह सच में पिट जाता उससे। पर यह तन्मय क्यों इतना शांत रहता है? कोई कुछ भी बोलता है तो या तो उसे जवाब नहीं देता या फिर उसकी तरफ देखने लगता और जब वो उससे बात करने जाती तो ऐसा बर्ताव करता मानों उसे जानता ही ना हो।

और उसपे यह वियान। हमेशा परेशां करता रहता है।

बड़ी सी दुनिया में परी बिल्कुल अकेली पाती खुद को। किससे बात करे? क्या अपनी दीदी (कजिन) से? पर उसको तो कभी भी कोई भी बात हज़म ही नहीं होती। तो क्या कजिन भाई से? पर वो कैसे समझ पाएगा एक लड़की के मन की बात? है तो वो भी लड़का ही ना।

इतने में वियान फिर से उसके पास आया, "दीदी मेरा हिंदी का काम छूट गया है। नोट कर दोगी," वो बोला। "मम्मी के आने से पहले।"

हमेशा लड़ने वाला भाई जब उससे सीक्रेट शेयर करता है तो उसे बड़ा अच्छा लगता है। परी ने वियान के एक दोस्त से काम नोट कर दिया तो वियान ने उसे एक बड़ा सा थैंक यू भी बोला।

अच्छा लगा उसे। मम्मी ने भी आज उसकी पसंद का खाना बनाया और पापा ने भी खूब प्यार किया। अपनी छोटी छोटी खुशियां समेटे परी फिर से तैयार थी अपने अगले दिन के लिए।

परी खुश थी सुबह बहुत। स्कूल में निधि ने उसे सॉरी भी बोला और सुमेधा ने भी। और तीनों ने दिन भर मस्ती की। तन्मय ने खुद आ कर उससे बात की। किसी ने भी उसे तंग नहीं किया।

वो  दुनिया जिससे वो कल इतनी नाराज़ थी, आज सब अपनी लगने लगी थी। बहुत खुश थी वो आज।

स्कूल से लौटते समय जब उसने कोट की जेब में हाथ डाला और ताला खोलने लगी तो मुस्कुराते हुए सोच रही थी, "काश! मम्मी आप घर पे होती।"

© उपमा डागा पार्थ २०१४


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