शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

काश मम्मी

घर के दरवाज़े तक पहुँचने से पहले ही उसने अपने कोट की जेब से घर की चाभी निकाली और तीन बार घुमाते हुए ताला खोला। स्कूल बैग सोफे पर पटक कर वो बाथरूम की तरफ भागी और वियान स्कूल बैग के साथ टीवी वाले कमरे में।

बाथरूम में परी कितनी देर रोती रही, शायद आधा घंटा। पर कोई भी नहीं था उसे चुप करवाने वाला। उसने रोते-रोते सोचा मम्मी काश आप घर पे होती।

मम्मी पापा ऑफिस में थे और छोटा भाई वियान, उसे तो कभी परी की परवाह हुई ही नहीं। जब देखो लड़ता रहता है।

वो मुंह हाथ धो कर टीवी वाले कमरे में गई। टीवी पर कोई कार्टून फ़िल्म चल रही थी। वियान कभी बैठे-बैठे हंसने लगता तो कभी बिस्तर पर उछलने लगता। परी भी साथ ही बैठ गई। उदास चेहरे पर थोड़ी तो मुस्कान आई, पर पूरी तरह नहीं। इतने में वियान ने कहा दीदी खाना ले आओ। भूख लगी है।

"पहले यूनिफार्म बदलो।" परी ने दीदी होने के कारण उसको बोला, चाहे उसे खुद भी अभी कपड़े बदलने थे।

पर वियान अभी बात मानने के मूड में नहीं था और यह बात बढ़ते-बढ़ते लड़ाई में बदल गई। अंत में परी पैर पटकते हुए खाना गरम करने चली गई। उसके जाने के बाद  वियान ने भी चुपचाप कपड़े बदल लिए। और मुंह बना के फिर टीवी के आगे बैठ गया। परी माइक्रोवेव के आगे खड़ी गुस्से से लाल पीली हो रही थी।

"पता नहीं हर कोई उसी पे क्यों रौब डालता है? फिर चाहे वो मम्मी, पापा हो, टीचर हो, दोस्त हो या यह टिंगू सा वियान। कोई भी उसे समझता क्यों नहीं है।"

स्कूल से आ कर यह घर उसे काटने को दौड़ता। कोई बात करने को नहीं। स्कूल की बातें, उसकी बातें सुनने वाला कोई नहीं। और वियान… उसको तो कुछ बोलना न बोलना बराबर था।

काश! मम्मी पहले की तरह घर पर होती। अपने हाथों से गरम-गरम खाना बना कर देती। उसकी बातें सुनती। पर…

खाना गरम हो गया था। वो दोनों के लिए खाना ले कर कमरे में चली गई। एक प्लेट वियान के आगे खिसका दी। एक से खुद खाने लगी। पर वियान तो अभी भी गुस्से में था। फिर उसने चुपचाप उसके मुंह में भी कौर दे दिया। भूख तो उसे भी लगी हुई थी, तो उसने भी चुपचाप खाना शुरू कर दिया। टीवी एक दोस्त या अभिभावक की भूमिका निभा रहा था। खाना खा कर भी दोनों बड़ी देर तक टीवी के आगे ही बैठे रहे। अचानक फ़ोन की घंटी बजी। रोज की तरह इस समय मम्मी ही फ़ोन कर रही होगी, यह सोच कर वियान ने फटाफट टीवी बंद कर दिया।
वह बैग की तरफ भागा और परी फ़ोन की तरफ। मानों मम्मी फ़ोन से निकल कर बाहर आ जाएगी।  

"क्या हो रहा है ?"

"बस अभी खाना खाया। "

"इतनी लेट क्यों ?"

परी ने वियान की तरफ देखा, मानों पूछ रही हो ले दूं तुम्हारा नाम? फिर बोली, "थोड़ी मस्ती कर रहे थे। "

"हूँ। मस्ती थोड़ी कम करो अब। एग्जाम आने वाले हैं," मम्मी बोली। फिर थोडा रुक कर बोली, "और वियान क्या कर रहा है?"

"पढ़ने बैठने लगा है।"

"उसको बोलो अब बैठ जाए और तुम भी अब काम कर लो।"

"अच्छा मम्मी," परी बोली।

"और हाँ, वाशिंग मशीन में कपड़े रखे हैं, सुखा देना।"

"अं… हूँ। नहीं मम्मी…"

"ठीक है। रहने दो। सब कुछ मैं ही कर लूँगी," मम्मी की आवाज़ थोड़ी तेज हो गई।

परी को लगा मम्मी गुस्सा हो गई। तो साथ ही मनाने वाले अंदाज़ में बोली, "मैं तो कर रही थी
… आप तो मज़ाक भी नहीं समझती।"

"चलो अब बाद में बात करती हूँ," मम्मी बोली और फ़ोन रख दिया।

मम्मी के पास तो बात करने के लिए दस मिनट की भी फुर्सत नहीं है।

साल भी तो नहीं हुआ अभी इस बात को। मम्मी पापा कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। जब पापा ने मम्मी को बताया था कि उनकी नौकरी अब नहीं रही और उसके बाद मम्मी को जो भी पहला जॉब ऑफर मिला उन्होंने ले लिया ताकि इस मुश्किल घड़ी से निकलने की सब मिल-जुल कर कोशिश कर सके। उस समय मम्मी पापा ने उन दोनों को भी बिठा कर सारी बात समझाई थी।

इस बीच में पापा कभी घर पर कुछ काम कर रहे होते तो कभी कुछ काम के सिलसिले से बाहर जाते और मम्मी रोज ही। उस समय उनका बाहर आना जाना, घूमना फिरना काफी कम हो गया था पर फिर भी सब एक दूसरे के साथ थे।

हालात धीरे-धीरे बेहतर, फिर ठीक हो गए। दो महीने पहले पापा की नौकरी लग गई। उस दिन कितने खुश थे सब। पिज़्ज़ा मंगवाया, फिर बाहर आइसक्रीम खाने भी गए। वियान ने कैसे उस समय पूछा था, "पापा! अब तो हम मॉल जा सकते हैं ना?"

और मम्मी पापा हंस पड़े थे। पर बाद में उसने मम्मी को पापा का हाथ दबाते हुए देखा था। वियान के इस इमोशनल से सवाल पर पापा ने बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोके थे। पर उसने यह सब देख लिया था।

आज कितने महीने हो गए हैं यूं ही स्कूल से आ कर अकेले घर में घुसते।

आज तो स्कूल में उसकी निधि और सुमेधा से खूब लड़ाई हुई। जब भी निधि को कोई काम होता तो उसके पास पहुँच जाती वर्ना सुमेधा सुमेधा ही करती रहती है। और वो पता नहीं किस बात का इतना इतना घमंड है उसको। कभी-कभी मन करता कि स्कूल ही बदल ले। पर स्कूल बदलने पर वहाँ भी ऐसे ही दोस्त मिले तो ?

पर आज तो। निधि और सुमेधा से ज्यादा उसे तन्मय और शंशाक पर गुस्सा आ रहा था। क्लास में हर कोई उसे तन्मय का नाम ले कर चिढ़ाने लगा है। तंग आ गई है वो सबको चुप करवाते करवाते। अब तो उसने कुछ कहना भी छोड़ दिया है।

सबसे ज्यादा तो यह शशांक। आज तो वह सच में पिट जाता उससे। पर यह तन्मय क्यों इतना शांत रहता है? कोई कुछ भी बोलता है तो या तो उसे जवाब नहीं देता या फिर उसकी तरफ देखने लगता और जब वो उससे बात करने जाती तो ऐसा बर्ताव करता मानों उसे जानता ही ना हो।

और उसपे यह वियान। हमेशा परेशां करता रहता है।

बड़ी सी दुनिया में परी बिल्कुल अकेली पाती खुद को। किससे बात करे? क्या अपनी दीदी (कजिन) से? पर उसको तो कभी भी कोई भी बात हज़म ही नहीं होती। तो क्या कजिन भाई से? पर वो कैसे समझ पाएगा एक लड़की के मन की बात? है तो वो भी लड़का ही ना।

इतने में वियान फिर से उसके पास आया, "दीदी मेरा हिंदी का काम छूट गया है। नोट कर दोगी," वो बोला। "मम्मी के आने से पहले।"

हमेशा लड़ने वाला भाई जब उससे सीक्रेट शेयर करता है तो उसे बड़ा अच्छा लगता है। परी ने वियान के एक दोस्त से काम नोट कर दिया तो वियान ने उसे एक बड़ा सा थैंक यू भी बोला।

अच्छा लगा उसे। मम्मी ने भी आज उसकी पसंद का खाना बनाया और पापा ने भी खूब प्यार किया। अपनी छोटी छोटी खुशियां समेटे परी फिर से तैयार थी अपने अगले दिन के लिए।

परी खुश थी सुबह बहुत। स्कूल में निधि ने उसे सॉरी भी बोला और सुमेधा ने भी। और तीनों ने दिन भर मस्ती की। तन्मय ने खुद आ कर उससे बात की। किसी ने भी उसे तंग नहीं किया।

वो  दुनिया जिससे वो कल इतनी नाराज़ थी, आज सब अपनी लगने लगी थी। बहुत खुश थी वो आज।

स्कूल से लौटते समय जब उसने कोट की जेब में हाथ डाला और ताला खोलने लगी तो मुस्कुराते हुए सोच रही थी, "काश! मम्मी आप घर पे होती।"

© उपमा डागा पार्थ २०१४


मंगलवार, 29 जनवरी 2013

धुरी पे घूमती ज़िन्दगी

नमिता आज सफाई के मूड में थी। कहाँ से शुरू करे बस यही सोच रही थी। 

कमरे में तो बस मिटटी थी जो झाड़ने से साफ़ हो जाती पर उस की अलमारी एक अरसे से मानों उसका इंतजार कर रही थी कि कभी तो नमिता उसकी सुध लेगी। अलमारी की शिकायत भी उसके मन की तरह थी। फिलहाल उसे लगा कि ज्यादा जरूरत अलमारी को थी।

नमिता एक-एक कर अलमारी में से चीजें निकलने लगी। थोड़ी देर में पूरी अलमारी बेड पर थी। और उसमें कपड़े कम, कागज, डायरी, पत्र और कार्ड ही ज्यादा थे।

"उफ़," नमिता के मुँह से निकला।

"पता नहीं क्या कुछ इकठ्ठा कर के रखा है? इन सारे फालतू कागजों से तो मैं आज छुटकारा पा कर ही दम लूंगी," नमिता ने खुद को डांटते हुए कहा। 

पहले कपड़ों की दोबारा तह लगाते हुए उसने उनको करीने से अन्दर रखा। अब बचा उसका खज़ाना। इसको समेटने के लिए तो समय चाहिए था। तो वह बिस्तर पर इन सब के बीच बैठ गई।

एक ढेर में सिर्फ चिठ्ठियाँ थी। नमिता ने बड़े प्यार से चिठ्ठियों पर हाथ फेरा। मानों अपने अतीत को सहला रही हो। सच कितना शौक था उसे चिठ्ठियाँ लिखने का। बड़े मन से लिखती थी वो। मानों अपने भाव, अपना प्यार, अपने विचार किसी अपने तक पहुँचाने का चिठ्ठी से अच्छा कोई साधन हो ही नहीं सकता।

पहली चिठ्ठी उसके हाथ में किरण की आई। किरणउसकी पाँचवी कक्षा की सहेली। नमिता को याद आया कि अक्सर गर्मियों की छुट्टियों में मुंबई जाया करती थी, जहाँ उसके ननिहाल और ददिहाल दोनों थे। बस उन्हीं दिनों उसे किरण की चिठ्ठियाँ मिला करती थी। 

चिठ्ठी क्या थी छुट्टियों की पूरी दिनचर्या थी। उसने छुट्टियों में क्या किया और क्या करेगी। नमिता हमेशा डांटती थी किरण को कि क्या चिठ्ठी में सारे दिन का लेखा-जोखा भर देती हो। कभी दिल से भी लिखा करो। इस पर किरण हंस के जवाब देती कि उसे नमिता जैसे चिठ्ठी नहीं लिखनी आती। फिर नमिता हँसते हुए उसे कहती कि भाव डाला करो उसमें अक्षर नहीं। तो किरण सर मारते हुए कहती अब इतने भाव नहीं है उसके पास। 

एक मुस्कान आ गई उसके चेहरे पर। चिट्ठी पढ़ के और किरण को याद करके। पता नहीं कहाँ होगी वो... ऐसी ही ७-८ चिट्ठियां थी उसकी। 

फिर मुग्धा की चिट्ठी हाथ में आई। मुग्धा नवीं कक्षा में नमिता की क्लास में आई थी, सेशन के बीच में। तो मैडम ने मुग्धा का छूटा हुआ काम पूरा करवाने की जिम्मेदारी नमिता को दी थी। उसी का धन्यावाद पत्र।

मुग्धा की बहुत मदद की थी नमिता ने। लेकिन एक बार जब नमिता बीमार पड़ी तो काम पूरा करने के लिए मुग्धा ने अपनी कॉपी देने से साफ़ इंकार कर दिया। परीक्षाएं नज़दीक ही थी और इस बार उसे मदद की जरूरत थी। उसे मुग्धा का व्यवहार समझ में नहीं आया। फिर कक्षा के कुछ बच्चों ने बताया कि वो सभी को यह कहती फिर रही थी कि इस बार वो टॉप करेगी, नमिता नहीं। पर टीचर्स और बाकी बच्चों की मदद से काम पूरा करके उसने पहली पोज़ीशन हासिल कर ली थी।

और मुग्धा ने उसे फिर एक चिठ्ठी लिखी थी। जिसमे सिर्फ सफाई और छोटी सी माफ़ी थी।

"मुग्धा! तुमने मुझे छोटी सी उम्र में ही जिन्दगी से रूबरू करवाने की कितनी कोशिश की थी। पर मैं भी न ..."

नमिता मानों मुग्धा की दी हुई सीख को आज के माहौल में फिट करने की कोशिश कर रही थी। यही तो होता है आजकल। किसी का हाथ पकड़ कर एक ऊंचाई तक पहुँचो फिर उसी ऊंचाई पर अपना हक ज़माने के लिए उसे ही धक्का दे दो जो आप को वहाँ तक लाया है। लेकिन ऊंचाई पर चढ़ने की यह कोशिश या रास्ता उसे कभी भी समझ में नहीं आया। न तब, न अब। और भी दो तीन चिठ्ठियाँ थी उसकी। पर नमिता ने उन्हें बिना खोले ही उनको अलग कर दिया।

"अरे नीरू मैडम की चिठ्ठी!"

नीरू मैडम उसके स्कूल में बी एड की ट्रेनिंग पर आई थी। उनसे उसकी इतनी अच्छी बनने लगी थी कि जाते समय उन्होंने उसे अपने घर का पता भी दिया और चिठ्ठी लिखने का वादा भी। बस फिर तो चिठ्ठियों का दौर शुरू हो गया। पहले आपस की, परिवार की, एक दुसरे के बारे में जानने की बातें। अचानक एक दिन पता चला उनकी शादी हो गई। वो नाराज तो बहुत हुई कि उन्होंने शादी में नमिता को नहीं बुलाया। 

नमिता नीरू मैडम पर एक हक समझने लग गई थीएक छोटी बहिन का हक। लेकिन नीरू मैडम ने बताया कि सब कुछ इतनी जल्दी-जल्दी हुआ कि कुछ पता ही नहीं चला। लड़के वाले देखने आये और शादी कर के ले गए। नमिता को बहुत ख़ुशी हुई। पर धीरे-धीरे पत्रों का सिलसिला कम हो गया, फिर अचानक बंद।

एक खुबसूरत सा रिश्ता जब अचानक ख़त्म होता है तो कुछ तकलीफ तो होती है। पर कितनी हुई थी उस समय, यह अब नमिता को ठीक से याद नहीं था, पर हुई जरूर थी।

"यह लिखावट किसकी है?" नमिता ने मानों खुद से पूछा। 

कॉलेज कैंप से जब वो लोग मनाली गए थे, तो वहां एक और कॉलेज की लड़कियों से दोस्ती हो गई थी। उसी में से एक, रीना की चिठ्ठी थी। बड़ी ही रस्मी। सवालों से भरी। मानों पहली बार में ही सब कुछ जान लेना चाहती हो। और जहाँ तक नमिता को याद था उसने या तो इस चिठ्ठी का जवाब नहीं दिया या लिख के पोस्ट नहीं किया।

और भी कई चिठ्ठियाँ थीउसके रिश्तेदारों की, नौकरी के लिए अर्जी वाली चिठ्ठियों की कॉपी भी उसने संभाल कर रखी थी।

फिर एक लिखावट देख कर उसकी आँखों में प्यार छलकने लगा।

"मम्मी," वो इतना ही कह पाई।

नमिता के हॉस्टल में आने के बाद बहुत ज्यादा तो नहीं पर कुछ चिठ्ठियाँ तो लिखी थी मम्मी ने। किसी में हिदायतों से शुरू कर, प्यार पर ख़त्म करती, तो किसी में प्यार से शुरू कर हिदायतों पर ख़त्म करती। "मम्मी! आप कभी नहीं बदलोगी। शायद आज भी आप चिठ्ठी लिखो तो ऐसी ही लिखोगी। प्यार, चिंता और सुझावों का संगममेरी माँ।"

फिर एक ढेर आया हाथ में। बड़ी प्यारी सी लिखावट का। पहचानने में समय नहीं लगा उसे। पर वह चाह कर भी उनको पढ़ नहीं पाई। शब्द अभी भी उनमें वही होंगे जो पहले थे। पर पहले उसने जैसे उन चिठ्ठियों को पढ़ा था, वैसे वो अब नहीं पढ़ पाएगी। इसलिए नमिता ने जैसे उन्हें उठाया था, वैसे ही वापिस रख दिया। अतीत के उस सफ़र पर दोबारा जाने की हिम्मत या इच्छा नमिता की नहीं थी। वो ढेर एक तरफ रखते हुए पता नहीं क्यों एक ठंडी सी साँस निकली उसके अन्दर से।

फिर एक पुलिंदा तो नहीं, हाँ ४-५ चिठ्ठियाँ थी अभिनव की। जो कभी-कभार उसके मायके जाने पर उसने लिखी थी। सारी चिठ्ठियाँ पढ़ कर उसे हँसी आ गई। क्योंकि अगर १-२ लाइन हटा दी जाए तो सारी चिठ्ठियों का मजमून एक ही था। कैसी हो? घर में सब कैसे हैं? अपना और बच्चों का ध्यान रखना। वगैरह वगैरह। उसने हँसते हुए बंडल साइड में रख दिया।

अब बस एक बंडल बचा थाउन चिठ्ठियों का जो उसने अलग-अलग टाइम में अलग-अलग लोगों को लिखी थी। पर शब्दों को पिरोने में शायद इतना समय लगा दिया कि उनके पहुँचने का औचित्य ही ख़त्म हो गया। और वो पत्र उसी के पास रह गए उसकी धरोहर बन कर।

ऐसा ही एक ढेर कार्ड्स का भी था। पर आज वो इतनी बार भावनाओं के समंदर में गोते लगा चुकी थी कि थक गई थी। अब उसमें और शक्ति नहीं थी।

हर बार यही होता है। वो सब कुछ ले कर बैठती है कि इन सब को नहीं रखेगी अब अपने पास। पर हर बार कागज, चिठ्ठी, डायरी और कार्ड्स में से एक चीज़ खोलती और बस गुजरी हुई जिन्दगी का एक चक्कर लगाती, कुछ भूली सी बातें याद करती और फिर उनको ज्यूँ का त्यूँ रख देती। पता नहीं क्यूँ?

पता नहीं इन सब में उसने क्या सहेज कर रखा था। अपनी निकल चुकी आधी जिंदगी या आधी-आधी कितनी कहानियां... बिना किसी अंत के।

© उपमा डागा २०१२

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

गाजर का हलवा

आज सुबह से ही निर्मला बहुत व्यस्त थी। बाजार, घर का काम करते करते थक गई थी वो। पाँच मिनट बैठती थी एक कप चाय पीने को, फिर काम में लग जाती। क्यों न हो, आखिर उसका बेटा पूरे  डेढ़ साल बाद उससे मिलने आ रहा था। निर्मला का बेटा - राजेश।

राजेश के बारे में सोचने से ही उसके चेहरे पे ममतामयी मुस्कान आ जाती। शुरू से ही थोडा शर्मीला था, पर बच्चों की बात समझने के लिए माँ को कभी शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। उसके भाव से वो समझ जाती कि अब उसे कुछ चाहिए या कुछ कहना है। फिर प्यार से गोद में बिठाती और पूछती, "मेरे राजू को कुछ चाहिए?" वो धीरे से सर हिला देता और निर्मला अलादीन के जिन्न की तरह उसकी हर इच्छा पूरी कर देती।


फलैश बैक से निकल कर निर्मला उठी और उसने कड़ाही गैस पर चढ़ा दी। बस डेढ़ घंटा और। अरे राजू के आने में नहीं, वो तो शाम को आएगा। उसके मनपसंद गाजर के हलवे को बनने में। घी, कद्दूकस की हुई गाजरें, चीनी, खोया और ढेर सारे मेवे। सब चीज़ें उसने एक जगह पर इक्कठी कर ली थी।

घी गरम करके उसने धीमी आंच पर ही गाजर को भूनना शुरू किया। निर्मला को याद आया कि कैसे बचपन में, जैसे ही स्कूल से आ के राजू को पता चलता था कि आज गाजर का हलवा बना है, तो वह खाने की जगह हलवा ही खाता। मन भर के। राजू का मन भरता और निर्मला को लगता उसका पेट भर गया। फिर तो आते जाते दो चार चम्मच खाता रहता।

"बिलकुल पागल था हलवे के पीछे," निर्मला ने मुस्कुराते हुए मानों खुद को ही कहा हो। और चीनी डाल के फिर से भूनना शुरू कर दिया। पूरे पौने दो घंटे लगे निर्मला को गाजर का हलवा बनाने में। बाजुओं ने बिलकुल ही जवाब दे दिया था। वो निढाल सी हो के बिस्तर पे बैठ गई। उसे धयान आया कि सुबह से उसने कुछ खाया ही नहीं है। सिर्फ तीन बार चाय ही पी है। तभी उसे इतनी कमजोरी लग रही थी। पर अब मन नहीं था कुछ बनाने का। एक बार मन हुआ कि थोड़ा सा हलवा ही खा ले। फिर लगा नहीं पहले राजू को चखाएगी तभी तो उसकी मेहनत सफल होगी... जब वो और माँगेगा।

पर रोटी बनाने की इच्छा नहीं थी। देखा तो फ्रिज में दो पीस ब्रेड के रखे थे। बस वही खा लिए। किसी के लिए खाना बनाना जहाँ उसे तृप्ति देता था, अपने लिए कुछ भी बनाना उसके लिए बस सिरदर्दी होती थी।

ब्रेड खा के निर्मला थोड़ी देर लेट गई। शायद बुढ़ापे के कारण ज्यादा काम करने से थकान हो गई थी। वो कब सो गई पता ही नहीं चला। शाम को कॉल-बेल की तेज आवाज़ सुन के उसकी आँख खुली। "अरे! इतनी देर हो गई। लाइट भी नहीं जलाई। पता नहीं राजू कहाँ पहुंचा होगा।" सब एक साथ बोलते हुए वो बिस्तर से उठी दरवाज़ा खोलने।

"क्या माँ? कब से बेल बजा रहा हूँ। तुम्हें पता भी था मैं आ रहा हूँ फिर भी ऐसे सो रही हो। कोई चिंता ही नहीं है। इतना लम्बा सफ़र... उफ़!" कहता हुआ राजेश माँ के पैर छूने की रस्म अदा करता हुआ अन्दर चला गया।

निर्मला वहीं खड़ी रही सारे आशीर्वाद मुँह में लिए हुए। फिर अन्दर आते हुए, दरवाज़ा बंद करते-करते निर्मला ने अफ़सोस भाव से कहा मानो अपनी सफाई दे रही हो, "पता नहीं बेटा कैसे आँख लग गई। मैं तो इस समय कभी सोती भी नहीं। बहुत देर से बेल बजा रहे थे क्या?"

"चलो छोड़ो। जो हो गया सो हो गया।"

निर्मला रसोई में चली गई, पानी लेने। पानी का गिलास पकड़ाते हुए बोली," कोई दिक्कत तो नहीं हुई सफ़र में?"

"नहीं सब ठीक था," राजेश ने पानी पीते हुए, थोड़ा शांत होते हुए कहा।

"घर में बहू, सौम्या, रचित सब ठीक हैं?'

"सब ठीक हैं माँ। मैं जरा फ्रेश हो के आता हूँ," राजेश ने उठते हुए कहा।

"जा बेटा। चाय चढ़ाऊ क्या?" निर्मला ने पूछा।

"हाँ माँ।"

निर्मला किचन में चाय चढ़ाते हुए सोचने लगी पता नहीं इन मरी गाजरों में आजकल कितनी खाद डालने लगे हैं। पहले तो इसी हलवे की इतनी खुशबू आती थी कि घर में घुसते ही राजू को पता चल जाता था कि आज गाजर का हलवा बना है।

चाय के साथ बिस्किट और नमकीन ले कर निर्मला कमरे में गई। चाय का कप हाथ में ले कर राजेश ने माँ का, पड़ोसियों का, रिश्तेदारों का हाल चाल पूछा। निर्मला के पास तो बातों का ढेर था। पर फिलहाल उन्हीं सवालों के जवाब दिए जो उसने पूछे थे। चाय खत्म कर के राजेश ने कहा, "कल मेरी मीटिंग है, यहीं होटल में। तो मुझे थोड़ी सी तैयारी करनी है।"

"ठीक है राजू। बस इतना बता दे कौन सी सब्जी खायेगा? दम आलू, पनीर या फिर तेरा स्पेशल भर्ता," माँ ने लाड़ से पूछा।

"अरे नहीं माँ। इतना हैवी कुछ नहीं खाऊंगा। दम आलू में तो बहुत आयल होगा। कुछ भी हल्का सा बना लो," राजेश ने लैपटॉप खोलते हुए कहा।

अच्छा। हल्का सा। उसने फटाफट दाल और बीन्स आलू चढ़ा दिए।

दो घंटे बाद राजेश का काम ख़तम हुआ। निर्मला को जोर से भूख लगी हुई थी, पर बेटे के बगैर कैसे खाती तो बस चार पाँच बार दरवाज़े से देख कर आ गई और इंतजार करती रही उसके काम के खत्म होने का।

माँ ने दाल, सब्जी परोसी और घी से चुपड़ी नरम सी रोटी निकाल कर प्लेट में रखी और अपनी थाली भी लगाने लगी। "यह क्या माँ। आपने रोटी में घी लगा दिया। मैं तो आजकल खुशक फुल्का लेता हूँ। चलो अब कल मत लगाना।"

निर्मला को याद आया कैसे दो-दो बार घी लगवा के रोटी बिना सब्जी के खा जाता था और कहता था, "माँ! आप तो मुझे ऐसे ही रोटी दे दिया करो। आपकी रोटी तो इतनी नरम होती है कि सब्जी की भी जरूरत नहीं पड़ती।"

खैर दोनों खाना खाने लगे। सब्जी खाते हुए बोला, "माँ! रीता तो अब बेक्ड सब्जियां बनाती है। आप आओगी न तो मैं बेक्ड बीन्स बनवाऊंगा। बिलकुल फैट नहीं होता। देखो, मैंने दो महीने में तीन किलो वज़न कम किया है।"

"हाँ। कुछ कमजोर सा तो लग रह है बेटा," निर्मला ने उसे गौर से देखते हुए कहा।

"कमजोर नहीं माँ... फिट," राजेश ने हँसते हुए कहा। निर्मला बस मुस्कुरा दी। खाने के बाद वो दो प्लेटों में हलवा ले आई। लगा देख के ही वो चिल्ला देगा।

हलवा देख कर राजेश ने कहा, "अरे वाह! गाजर का हलवा!"

निर्मला को लगा चलो उसकी बनाई कोई चीज़ तो पास हुई। वो प्यार से उसे निहारने लगी।

"पर माँ इतना नहीं खाऊंगा। बस दो चम्मच। मैंने तो मीठा खाना बिलकुल बंद कर दिया हुआ है। पर आपके हाथ का हलवा छोड़ नहीं सकता," कहते हुए उसने दो चम्मच हलवा एक कटोरी में निकाल लिया। 

और निर्मला को अचानक लगा वो बहुत थक गई है।

© उपमा डागा
२०१२

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

बारिश और धूप

खड़े-खड़े वो थक गई थी, तो कमरे में ही टहलते टहलते कुर्सी पे जा के बैठ गई। पता नहीं आज घड़ी की सुईयां धीरे चल रही थी या वो ज्यादा बैचैन थी।

वक़्त था कि कट ही नहीं रहा था। उसने चार बजे नीरव को फ़ोन किया था कि प्लीज़ आज घर जल्दी आ जाना और इस समय रात के १० बज गए थे और अभी तक उसका कुछ पता नहीं था। धीरे-धीरे गुस्सा चिंता में बदलता जा रहा था।

बचपन से ही आरती को बारिश बहुत अच्छी लगती थी। ऐसा लगता था मानो भगवान ने सारे ग़म, चिंता भुलाने के लिए ही इस मौसम को बनाया है। बारिश के आते ही वो बस चहकने सी लगती।

पकौड़े, पुए और कितने ही पकवानों की वो माँ से फरमाइश करती और बारिश में खूब भीगती। उसकी तो जैसे मस्ती दुगनी हो जाती। माँ बीच-बीच में ज्यादा भींगने से मना करती, बीमार होने का डर उसे सताने लगता। इस पर पिता जी कहते, "करने दो उसे मस्ती। यह भोलापन और उछलकूद देखने को बाद में हम तरस जायेंगे।" पहले उसे इसका मतलब तो समझ में नहीं आया पर पिता जी की इजाजत मिलना उसके लिए काफी था।

अब उसे पिता जी की उन बातों का मतलब समझ में आ गया था शायद। शादी के बाद एक संयुकत परिवार में गई थी वो। बहुएं कैसे रहती हैं यह उसे पहले कुछ दिनों में ही समझ आ गया था। मस्ती उसे पसंद थी पर रिश्ते निभाते माँ को देखा था और शायद देखते देखते सीख भी गई थी।

तीन सालों बाद नीरव को मुंबई में जॉब मिल गई तो दोनों वहीं आ गए। धीरे-धीरे वहां की भी आदत हो गई, हालांकि इस तरह अकेली वो कभी नहीं रही। पर अब सीख गई थी वो।

दोनों एक दुसरे को बेहतर समझ रहे थे, लड़ते थे, मनाते थे, अपनी जिम्मेदारियां समझने और निभाने की कोशिश कर रहे थे। और आज सबसे खास दिन था आरती के  लिए। मुंबई की पहली बारिश। लोग कहते हैं मुंबई की बारिश की बात ही कुछ और है। और आज उसने पहली बार महसूस किया की बारिश में अगर आपका प्यार आपके साथ न हो तो सब कैसे फीका फीका सा लगता है।

वो आज के दिन को यादगार बनाना चाहती थी ताकि जब भी मुंबई की पहली बारिश को याद करे तो एक मुस्कान होठों पे आ के बस रुक सी जाये। उसने ४ बजे ही नीरव को फ़ोन कर दिया था जल्दी घर आने को। नीरव के लाख पूछने पर भी उसने कारण नहीं बताया। फिर उसने नीरव की और अपनी पसंद का खाना बनाया। और अच्छे से तैयार हो कर उसका इंतजार करने लगी।

उधर नीरव से भी उसकी चह्चाहट छुपी नहीं थी। वो भी जल्दी-जल्दी सब काम निपटाने लगा। जैसे ही निकलने लगा तो बॉस ने अपने केबिन में बुला लिया।  अगले महीने के टार्गेट्स पे चर्चा करने के लिए। न चाहते हुए भी उसे बैठना पड़ा वहां।

उधर सजी सवंरी आरती धीरे-धीरे उदास होने लगी। फिर खुद को समझाते हुए उसने नीरव को कॉल किया जो उसने उठाया नहीं। दस दस मिनट के बाद उसने कॉल किया पर नीरव ने फिर नहीं उठाया। नीरव को बॉस के सामने फ़ोन उठाने में अजीब लगा क्योंकि उसे पता था कि फ़ोन रिसीव करते ही वो पूछेगी कि कब आ रहे हो।
आरती के तीन चार फ़ोन उसने काट दिए।

बड़ी मुश्किल से दो घंटे बाद वहां से निकला तो आरती को फ़ोन किया, पर गुस्से में आरती ने फ़ोन ही नहीं उठाया।

आरती को लगा नीरव को उसके गुस्से का पता चल गया होगा और जैसे ही दूसरी बार फ़ोन आएगा वो उठा लेगीनीरव ने सोचा था कि गाड़ी में बैठ कर उसे फ़ोन करेगा, लेकिन बारिश के कारण आज चारों तरफ जाम था। पांच मिनट की ड्राइव के बाद उसे १५-२० मिनट जाम में रहना पड़ता। इसी कारण वो आरती को फ़ोन कर ही नहीं पा रहा था।

बीच में फिर से परेशान आरती का फ़ोन आया तो ड्राइव करने के कारण उठा नहीं पाया और जब नीरव कॉल करने लगा तो फ़ोन की बैटरी ख़तम हो गई।

कही से कोई भी खबर न मिलने के कारण आरती की जान जैसे अधर में कहीं अटकी हुई थी,
पर नीरव को तो उसकी कोई फिकर ही नहीं थी। आने दो आज उसको, आज तो वो नीरव से बात ही नहीं करेगी। मन ही मन वो नीरव से नाराज़ भी हो गई और सोचने लगी कि जब तीन चार बार मनायेगा तब मानेगी।

कार चलाते हुए नीरव बार बार घडी की तरफ देख रहा था। एक तो जाम की टेंशन ऊपर से आरती के गुस्से की फिकर और यह फ़ोन तो किसी भी काम का नहीं है | आज जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तो...

जाने इस बॉस को भी आज ही टार्गेट पर चर्चा  क्यों करनी थी। वो उन सब बातों के बारे में सोच रहा था जिनको ले के आज दोनों में कहासुनी हो सकती थी। और वो आज लड़ना बिलकुल नहीं चाहता था।

अभी पिछले हफ्ते ही तो लेट आने को ले कर लड़ाई हुई थी दोनों की। और आज तो उसने सोचा था उसके टाइम के हिसाब से घर आ कर उसे खुश कर देगा और जाते हुए कोई गिफ्ट भी ले जायेगा पर इस भीड़ से पीछा छूटे तब न। अब तो उसे गुस्सा आने लग गया था।

घर पे गुस्से में आरती ने कपडे भी बदल लिए। पर अब तो ११ बजने वाले थे... कहाँ रह गया...

तभी बेल बजी। दरवाज़े पर नीरव था। "कहाँ थे तुम? मैं कब से तुम्हे फ़ोन कर रही थी। पर तुम पहले तो फ़ोन ही नही उठा रहे था फिर फ़ोन बंद कर के बैठ गए। पता है मैं कितनी परेशान हो रही थी। तुम्हे तो मेरी कभी फिकर ही नहीं रहती।" आरती एक ही सांस में सब कह गई।

जाम और काम  से परेशां नीरव ने कहा, "हाँ मुझे कोई फिकर नहीं है तुम्हारी। साला ५ घंटे भीड़ में फंस के आओ फिर घर आ के इन की चिक-चिक सुनो। आज तो बारिश ने सब कबाड़ा कर दिया। इस बारिश को भी आज ही होना था।"

"हाँ हाँ! अब तो मेरी बातें तुम्हें चिक-चिक ही लगेंगी। मैं ही पागल थी जो सुबह से लगी हुई थी। कुछ नहीं करूंगी आगे से। और हाँ, सारा कबाड़ा इस बारिश ने ही किया है," कहते हुए आरती बेडरूम में चली गई सोने। उसे लगा कोई गुस्से में भी कैसे बारिश को ऐसे कबाड़ा कह सकता है।

नीरव भी कपडे बदल कर लेट गया। एक ही बेड पे एक दुसरे की तरफ पीठ कर के लेते हुए थे। सोया कोई नहीं था दोनों में से पर कोई भी पहल करने को तैयार नहीं था। सुबह से थकी हुई आरती कब सो गई उसे खुद भी पता नहीं चला। और दोपहर से भूखे नीरव से जब रहा नहीं गया तो किचन में से कुछ खाने के लिए ढूँढने गया। वहां मटर पुलाव, पनीर, दाल मखनी और पूरी देख कर दंग रह गया। तो यह कारण था उसे घर जल्दी बुलाने का। और कैसे डांट दिया मैंने।

नीरव ने थोडा सा ले कर खाया और बाकी  फ्रिज में रख दिया। फिर देखा दुसरे कमरे में से कुछ महक सी आ रही है। वहां जा कर देखा तो मंद रौशनी, फूल और खुशबू से पूरा कमरा महक रहा था। नीरव अफ़सोस करता हुआ लेट गया।

सुबह आरती को उठने में थोड़ी देर हो गई। उठते ही लगा कल सब कुछ बाहर ही छोड़ दिया था, और नीरव के ऑफिस जाने का टाइम भी हो गया है। हे भगवान! सब जल्दी-जल्दी निपटाना होगा। वह फटाफट बाथरूम की तरफ भागी। जैसे ही  बाहर आई तो देखा नीरव एक ट्रे में दो कप चाय, सैंडविच और परांठे ले कर बेड पे उसका इंतजार कर रहा था।

"अरे मुझे उठाया क्यूँ  नहीं। तुम खाओ में लंच बना देती हूँ।" आरती जल्दी-जल्दी किचेन की तरफ जाने लगी।

नीरव ने उसे खीचते हुए अपनी गोद में ले लिया और बोला, "यह नाश्ता मेरे अकेले का नहीं है। आपका भी है मैडम।"

"पर लंच, ऑफिस, देर हो जाएगी न," आरती ने अपने आप को छुडवाने की नाकाम कोशिश की।

"चुप बिलकुल" नीरव ने उसे डाँटते हुए कहा, "आज मैंने ऑफिस से छुट्टी ली है। आप हमारे लिए इतना कर सकती हैं तो हम एक दिन तो आप के नाम कर ही सकते हैं।"

आरती के होठों पर हंसी आ गई।

बाहर तेज धूप थी पर पता नहीं क्यों आरती को कुछ बारिश का सा एहसास हो रहा था...

© उपमा डागा